+ कषाय भाव -
कषायाश्चापि चत्वारो जीवस्यौदयिकाः स्मृता: ।
क्रोधो मानोऽथ माया च लोभश्चेति चतुष्टयात्‌ ॥1053॥
ते चात्मोत्तरभेदैश्च नामतोऽप्यत्र षोडश ।
पञ्चविंशतिकाश्चापि लोकासंख्यातमात्रकाः ॥1054॥
अथवा शक्तितोऽनन्ताः कषायाः कल्मषात्मकाः ।
यस्मादेकैकमालापं प्रत्यनन्ताश्च शक्तयः ॥1055॥
अन्वयार्थ : क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय भी जीव के औदयिक भाव जानने चाहिये ॥१०५३॥ वे अपने उत्तर भेदों की अपेक्षा नाम से सोलह और पच्चीस हैं । वैसे असंख्यात लोकमात्र हैं ॥१०५४॥ अथवा शक्ति की अपेक्षा कल्मष रूप वे कषाय अनन्त हैं क्‍यों कि एक-एक आलाप के प्रति अनन्त शक्त्यंश होते हैं ॥१०५५॥