+ चारित्र-मोह भेद और कार्य -
अस्ति जीवस्य चारित्रं गुणः शुद्धत्वशक्तिमान्‌ ।
वैकृतोऽस्ति स चारित्रमोहकर्मोदयादिह ॥1056॥
तस्माच्चारित्रिमोहश्च तद्भेदाद् द्विविधो भवेत् ।
पुद्गलो द्रव्यरूपोऽअस्ति भावरूपोऽस्ति चिन्मय: ॥1057॥
अन्वयार्थ : जीव का एक शुद्ध शक्तिरूप चारित्र नाम का गुण है । किन्तु वह संसार दशा में चारित्रमोहनीय कर्म के उदय से विकृत हो रहा है ॥१०५६॥ इसलिए चरित्र-मोह द्रव्य और भाव के भेद से दो प्रकार का हो जाता है । द्रव्य चारित्रमोह पुद्गालात्मक है और भाव चारित्रमोह चैतन्यरूप है ॥१०५७॥