
अस्त्येकं मूर्तमद् द्रव्यं नाम्ना ख्यातः स पुद्गल: ।
वैकृत: सोऽस्ति चारित्रमोहरूपेण संस्थितः ॥1058॥
पृथिवीपिण्डसमानः स्यान्मोह: पौद्गलिकोऽखिल: ।
पुद्लः स स्वयं नात्मा मिथो बन्धो द्वयोरपि ॥1059॥
अन्वयार्थ : एक मूर्तिमान द्रव्य है जो पुद्गल नाम से प्रसिद्ध है, वह विकृत होकर चारित्र मोहरूप से स्थित है ॥१०५८॥ सब ही पोद्गलिक-मोह पृथिवी के पिण्ड के समान है । वह स्वयं पुद्गल है आत्मा नहीं है । किन्तु आत्मा और द्रव्य-मोह इन दोनों का बन्ध हो रहा है ॥१०५९॥