
द्विविधस्यापि मोहस्य पौद्गलिकस्य कर्मण: ।
उदयादात्मनो भावो भावमोह: स उच्यते ॥1060॥
जले जम्बालवन्नूनं स भावो मलिनो भवेत् ।
बन्धहेतु : स एव स्याद्-द्वैतश्चाष्टकर्मणाम् ॥1061॥
अपि यावदनर्थानां मूलमेकः स एव च ।
यस्मादनर्थमूलानां कर्मणामादिकारणम् ॥1062॥
अशुचिघार्थको रौद्रो दुःखं दुःखफलं च सः ।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वासां विपदां पदम् ॥1063॥
अन्वयार्थ : दोनों प्रकार के ही पौद्गलिक मोहनीय-कर्म के उदय से आत्मा का जो भाव होता है, वह भाव- मोह कहा जाता है ॥१०६०॥ जल में काई के समान नियम से वह भाव-मोह मलीन होता है और एक मात्र वही आठों कर्मों के बन्ध का हेतु है ॥१०६१॥ सब अनर्थों का मूल भी वही है , क्योंकि अनर्थों का मूल कारण कर्म है और उनका मुख्य कारण वह भावमोह है ॥१०६२॥ वह अशुचि है, घातक है, रौद्र है , दुःखरूप है और दुःख का फल है | इस विषय में बहुत कहने से कया प्रयोजन ? इतना कहना पर्याप्त है कि वह सब विपत्तियों का स्थान है ॥१०६३॥