कायकारणमप्येष मोहो भावसमाह्वयः ।
पूर्वबद्धानुवादेन प्रत्यग्रास्त्रवसंचयात्‌ ॥1064॥
यदोच्चैः पूर्वबद्धस्य द्रव्यमोहस्य कर्मणः ।
पाकाल्लब्धात्मसर्वस्वः कार्यरूपस्ततो नयात् ॥1065॥
निमित्तमात्रीकृत्योच्चैस्तभागच्छन्ति पुद्गला: ।
ज्ञानावृत्यादिरूपस्य तस्माद्भावोऽस्ति कारणम्‌ ॥1066॥
विशेष: कोऽप्ययं कार्यं केवलं मोहकर्मणः ।
मोहस्यास्यापि बन्धस्य कारणं सर्व कर्मणाम ॥1067॥
अस्ति सिद्धं ततोऽन्योन्यं जीवपुद्गलकर्मणोः ।
निमित्तनैमित्तको भावो यथा कुम्भकुलालयो: ॥1068॥
अंतर्दृष्टया कषायाणां कर्मणां च परस्परम् ।
निमित्तनैमित्तिको भावः स्यान्न स्याज्ज़ीवकर्मणों: ॥1069॥
यतस्तत्र स्वयं जीवे निमित्ते सति कर्मणाम्‌ ।
नित्या स्यात्कर्तृता चेति न्यायन्मोक्षो न कस्यचित्‌ ॥1070॥
इत्पेवं ते कषयाख्याश्चत्वारोऽप्यौदयिका: स्मृता: ।
चारित्रस्य गुणास्यास्य पर्याया वैकृतात्मनः ॥1071॥
अन्वयार्थ : यह भावमोह कार्य भी है और कारण भी है । पूर्व में बाँधे हुए कर्म के उदय से होता है इसलिये तो कार्य है और नवीन आस्रव के बन्ध का हेतु है, इसलिए कारण है ॥१०६४॥ जिस समय यह पूर्वबद्ध द्रव्य-मोह कर्म के प्रकृष्ट उदय से आत्मलाभ करता है उस समय उस अपेक्षा से वह कार्यरूप है ॥१०६५॥ और इसके निमित्त से ज्ञानावरणादि पुद्गल आते हैं इसलिये भावमोह कारणरूप है ॥१०६६॥ इसके विषय में ऐसी कुछ विशेषता है कि यह कार्य तो केवल मोहनीय कर्म का है परन्तु कारणमात्र मोहनीय के बंध का और सब कर्मों के बन्ध का है ॥१०६७॥ इससे यह बात सिद्ध होती है कि जिस प्रकार कुम्हार और घट का निमित्त नैमित्तिक भाव है उसी प्रकार जीव और पुद्गल का परस्पर
निमित्त नैमित्तिक भाव है ॥१०६८॥ अंतर्दृष्टि से देखने पर कषाय और कर्म का ही परस्पर में निमित्त-नैमित्तिक भाव है जीव और कर्म का नहीं ॥१०६५॥ क्योंकि कर्म-बंध में जीव को स्वयं निमित्त मान लेने पर जीव सदा ही उसका कर्ता बना रहेगा फिर कभी भी किसी को मुक्ति नहीं मिलेगी ॥१०७०॥ इस प्रकार वे चारों ही कषाय औदयिक जानना चाहिये। वे आत्मा के चारित्र गुण की विभाव पर्याय हैं ॥१०७१॥