+ नोकषाय -
लिङ्गान्यौदयिकान्येव त्रीणि स्रीपुन्नपुंसकात् ।
भेदाद्वा नोकषायाणां कर्मणामुदयात्‌ किल ॥1072॥
चारित्रमोहकर्मैतद्‌ द्विविधं परमागमात्‌ ।
आद्यं कषायमित्युक्तं नोकषायं द्वितीयकम्‌ ॥1073॥
तत्रापि नोकषायाख्यं नवधा स्वविधानत: ।
हास्यो रत्यरती शोको भीर्जुगुप्सेति त्रिलिङ्गकम् ॥1074॥
ततश्चारित्रमोहस्य कर्मणो ह्युदयाद्‌ ध्रुवम्‌ ।
चारित्रस्य गुणस्यापि भावा वैभाविका अमी ॥1075॥
अन्वयार्थ : स्त्री वेद, पुरुषवेद और नपुंसक वेद के भेद से तीनों लिंग औदयिक ही हैं, क्‍योंकि ये नोकषायों के अवान्तर भेद स्त्री-वेद, पुरुष-वेद और नपुंसक-वेद के उदय से होते हैं ॥१०७२॥ परमागम के अनुसार यह चारित्र-मोहनीय कर्म दो प्रकार का है -- पहला कषाय और दूसरा नोकषाय ॥१०७३॥ उसमें भी नोकषाय अपने भेदों के अनुसार नौ प्रकार का है -- हास्य , रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा और तीन लिंग ॥१०७४॥ इसलिये चारित्र-मोहनीय कर्म के उदय से होनेवाले ये भाव भी चारित्र गुण के वैभाविक-भाव हैं ॥१०७५॥