+ लिंग -
प्रत्येकं द्विविधान्येव लिङ्गानीह निसर्गत: ।
द्रव्यभावविभेदाभ्यां सर्वेज्ञाज्ञानतिक्रमात्‌ ॥1076॥
अस्ति यन्नाम कर्मैकं नानारूपं च चित्रवत् ।
पौद्गलिकमचिद्रूपं स्यात्पुद्गलविपाकि यत्‌ ॥1077॥
आङ्गोपांङ्गं शरीरं च तद्भेदौ स्तोऽप्यभेदवत्‌ । .
तद्विपाकात्‌ त्रिलीङ्गानामाकाराः संभवन्ति च ॥1078॥
त्रिलिंगाकारसम्पत्तिः कार्यं तन्नामकर्मणः ।
नास्ति तद्भावलिङ्गेषु मनागपि करिष्णुता ॥1079॥
भाववेदेषु चारित्रमोहकर्मांशकोदयः ।
कारणं नूनमेकं स्यान्नेतरस्योदयः क्वचित्‌ ॥1080॥
अन्वयार्थ : सर्वज्ञ की आज्ञा के अनुसार प्रत्येक लिंग स्वभाव से ही द्रव्य-वेद और भाव-वेद के भेद से दो प्रकार के होते हैं ॥१०७६॥ एक नाम-कर्म है, वह चित्रों के समान नाना प्रकार का है, पौद्गलिक है, जड़ है और पुद्गल-विपाकी है ॥१०७७॥ आंगोपांग और शरीर ये उसी के भेद है जो उससे जुदे नहीं हैं । इनके उदय से तीन लिंगों के आकार प्राप्त होते हैं ॥१०७८॥ तीन लिंगों के आकार का प्राप्त होना नाम-कर्म का कार्य है । यह भाव-लिंग में थोड़ा भी कार्यकारी नहीं है ॥१०७९॥ भाव-वेद में नियम से एक चारित्र-मोहनीय का उदय कारण है, किसी दूसरे कर्म का उदय किसी भी हालत में कारण नहीं है ॥१०८०॥
कर्म सिद्धान्त के नियमानुसार शरीर नाम कर्म और आंगोपांग नामकर्म का उदय शरीर ग्रहण के प्रथम समय से होता है और वेद नोकषाय का उदय भव के प्रथम समय से होता है। दूसरे एकेन्द्रिय के एकमात्र भाववेद होता हे, द्रव्यवेद नहीं होता इसलिये भाववेद में द्रव्यवेद को कारण मानना उचित नहीं है । इन दोनों की कार्य कारण भाव को व्याप्ति नहीं बनती यह उक्त कथन का तात्पर्य है।