


रिरंसा द्रव्यनारीणां पुंवेदस्योदयात् किल ।
नारीवेदोदयाद्वेद: पुंसां भोगाभिलाषिता ॥1081॥
नालं भोगाय नारीणां नापि पुंसामशक्तितः ।
अन्तर्दग्धोऽस्ति यो भावः क्लीववेदोदयादिव ॥1082॥
द्रव्यलिङ्गं यथा नाम भावलिङ्गं तथा क्वचित् ।
क्वचिदन्यतमं द्रव्यं भावश्चान्यतमो भवेत् ॥1083॥
यथा दिविजनारीणां नारीवेदोऽस्ति नेतरः ।
देवानां चापि सर्वेषां पाकः पुंवेद एवं हि ॥1084॥
भोगभूमौ च नारीणां नारीवेदो न चेतरः ।
पुंवेद: केवल: पुंसां नान्यो वाऽन्योन्यसम्मव: ॥1085॥
नारकाणां च सर्वेषां वेदश्चैको नपुंसकः ।
द्रव्यतो भावतश्चापि न स्त्रीवेदो न वा पुमान् ॥1086॥
तिर्यग्जातौ च सर्वेषां एकाक्षाणां नपुंसकः ।
वेदो विकलत्रयाणां क्लीव: स्यात् केवल: किल ॥1087॥
पञ्चाक्षासंज्ञिनां चापि तिर्यञ्चां स्यान्नपुंसकः ।
द्रव्यतो भावतश्चापि वेदो नान्य: कदाचन ॥1088॥
कर्मभूमौ मनुष्याणां मानुषीणां तथैव च ।
तिरश्चां वा तिरश्चीनां त्रयो वेदास्तथोदयात् ॥1089॥
केषाश्चिद् द्रव्यतः साङ्ग: पुंवेदो भावतः पुनः ।
स्त्रीवेदः क्लीववेदो वा पुंवेदो वा त्रिधापि च ॥1090॥
केषाश्चित्क्लीववेदो वा द्रव्यतो भावतः पुनः ।
पुंवेदो क्लीववेदो वा स्त्रीवेदो वा त्रिघोचितः ॥1091॥
कश्चिदापर्ययन्यायात् क्रमादस्ति त्रिवेदवान् ।
कदाचित्क्लीववेदो वा स्त्री वा भावात्क्वचित्पुमान् ॥1092॥
अन्वयार्थ : पुरुषवेद के उदय से स्त्रियों के साथ रमण करने की इच्छा होती है । स्त्रीवेद के उदय से पुरुषों के साथ भोग भोगने की अभिलाषा होती है और जो शक्तिरहित होने से न तो स्त्रियों के साथ भोग भोग सकता है और न पुरुषों के साथ भोग भोग सकता है, किन्तु भीतर ही भीतर जलता रहता है, वह नपुंसकवेद है । वह नपुंसकवेद के उदय से होता है ॥१०८१-१०८२॥ कहीं पर जैसा द्रव्यलिंग होता है वेसा ही भावलिंग होता है । कहीं पर द्रव्यलिंग दूसरा होता है और भावलिंग दूसरा होता है ॥ १०५३ ॥ खुलासा इस प्रकार है -- देव स्त्रियों के स्त्रीवेद ही होता है, अन्य वेद नहीं होता । इसी प्रकार सभी देवों के भी पुरुष-वेद ही होता है ॥१०८४॥ भोगभूमि में स्त्रियों के स्त्री-वेद ही होता है अन्य वेद नहीं होता और पुरुषों के पुरुष-वेद ही होता है अन्य वेद नहीं होता ॥१०८५॥ सभी नारकियों के द्रव्य और भाव दोनों प्रकार से एक नपुंसक वेद ही होता है स्त्री वेद या पुरुषवेद नहीं होता ॥९०८६॥ तिर्यंच-जाति में सभी एकेन्द्रियों के नपुंसक वेद दोता है, विकलत्रयों के भी नपुंसक वेद होता है और असंज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के भी नपुंसकवेद होता है, इन सब में द्रव्य और भाव दोनों प्रकार से नपुंसक वेद होता है, अन्य वेद नहीं होता ॥१०८७-१०८८॥ कर्म-भूमि में मनुष्य, मनुष्यनी, तिर्यंच और तिर्यंचनी इन चारों के उदयानुसार तीनों वेद होते हैं ॥१०८०॥ किन्हीं के द्रव्य से पुंवेद होता है और भाव से स्त्री वेद, नपुंसकवेद या पुरुषवेद होता है ॥१०९०॥ किन्हीं के द्रव्य से नपुंसक वेद होता है और भाव से पुंवेद, नपुंसकवेद या स्त्री वेद यथायोग्य होता है ॥१०९१॥ कोई एक-एक पर्याय तक क्रमानुसार तीन वेद वाला होता है। कदाचित् भाव से नपुंसक वेदी होता है या स्त्री वेदी होता है और किसी पर्याय में भाव से पुरुषवेदी होता है ॥१०९२॥