
त्रयोऽपि भाववेदास्ते नैरन्तर्योदयात् किल ।
नित्यं चाबुद्धिपूर्वाः स्युः क्वचिद्वै बुद्धिपूर्वकाः ॥1093॥
तेऽपि चारित्रमोहान्तर्भाविनो बन्धहेतवः ।
संक्लेशाङ्गैकरूपत्वात् केवलं पाप कर्मणाम् ॥1094॥
द्रव्यलिङ्गानि सर्वाणि नान्न बन्धस्य हेतवः ।
देहमात्रैकवृत्तत्वे बंधस्याकारणात्स्वतः ॥1095॥
अन्वयार्थ : ये तीनों ही भाव-वेद वेद-नोकषायों के निरन्तर उदय से होते हैं । ये सदा अबुद्धिपूर्वक होते हैं, कहीं बुद्धिपूर्वक होते हैं ॥१०९३॥ इनका चरित्र-मोह में अंतर्भाव होता है और संक्लेशरूप होने से केवल पाप-कर्मों के बन्ध के कारण हैं ॥१०९४॥ आगम में सभी द्रव्य-लिंग बन्ध के हेतु नहीं माने गये है, क्योंकि वे केवल देह से ही सम्बन्ध रखते हैं, इसलिये वे स्वयं बन्ध के कारण नहीं हो सकते ॥१०९५॥