+ मिथ्यादर्शन -
मिथ्यादर्शनमाख्यातं घातान्मिथ्यावकर्मणः ।
भावो जीवस्य मिथ्यात्वं स स्यादौदयिकः किल ॥1096॥
अस्ति जीवस्य सम्यक्त्वं गुणाश्चैको निसर्गजः ।
मिथ्याकर्मोदयात्सोऽपि वैकृतो विकृताकृति: ॥1097॥
उक्तमस्ति स्वरूपं प्राङ् मिथ्याभावस्य जन्मिनाम्‌ ।
तस्मान्नोक्तं मनागत्र पुनरुक्तभयात्किल ॥1098॥
अन्वयार्थ : मिथ्यादर्शन मिथ्यात्व कर्म के उदय से होता है । यही जीव का मिथ्यात्व भाव कहलाता है । वह नियम से औदायिक है ॥१०९६॥ जीव का एक स्वाभाविक सम्यक्त्वगुण है । वह मिथ्यात्व कर्म के उदय से विकृत हो रहा है ॥१०९७॥ जीवों के जो मिथ्याभाव होता है उसका स्वरूप पहले कह आये हैं इसलिए पुनरुक्त होने के भय से यहां उसका थोड़ा भी स्वरूप नहीं कहा है ॥१०९८॥