
अज्ञानं जीवभावो यः स स्यादौदयिकः स्फुटम् ।
लब्धजन्मोदयाद्यस्माज्ज्ञानावरणकर्मण: ॥1099॥
अस्त्यात्मनो गुणः ज्ञानं स्वापूर्वार्थावभासकम् ।
मूर्छितं मृतकं वा स्याद्वपु: स्वावरणोदयात् ॥1100॥
अर्थादोदयिकत्वेऽपि भावस्यास्याप्यवश्यतः ।
ज्ञानावृत्यादिबन्धेऽस्मिन् कार्ये वै स्याद्हेतुता ॥1101॥
नापि संक्लेशरूपोऽयं यः स्याद् बन्घस्य कारणम् ।
यः क्लेशो दुःखमूर्ति: स्यात्तद्योगादस्ति क्लेशवान् ॥1102॥
दुःखमूर्तिश्च भावोऽयमज्ञानात्मा निसर्गत: ।
वज्राघात इव ख्यातः कर्मणामुदयो यतः ॥1103॥
अन्वयार्थ : जीव का एक अज्ञानभाव है जो स्पष्टतः औदयिक है, क्योंकि वह ज्ञानावरण कर्म के उदय से होता है ॥१०९९॥ जीव का अपने स्वरूप का और दूसरे अपूर्व अर्थों का अवभासक एक ज्ञान गुण है । वह ज्ञानावरण कर्म के उदय से या तो मूर्छित शरीरवाला है या मृत शरीर जैसा है ॥११००॥ यद्यपि यह भाव औदयिक अवश्य है तथापि वह ज्ञानावर्णादि कर्मों के बन्ध कार्य का हेतु नहीं है ॥११०१॥ यह संक्लेश रूप भी नहीं है जिससे कि वह बन्ध का कारण हो । किन्तु जो क्लेश दुःख की मूर्ति है उसके सम्बन्ध से यह अवश्य ही क्लेशवाला हो रहा है ॥११०२॥ यह अज्ञानभाव स्वभाव से दुःख की मूर्ति है, क्योंकि कर्मों का उदय वज्र के आघात के समान माना गया है ॥११०३॥