ननु कश्चिद् गुणोऽप्यस्ति सुखं ज्ञानगुणादिवत् ।
दुःखं तद्वैकृतं पाकात्तद्विपक्षस्य कर्मण: ॥1104॥
तत्कथं मुर्छितं ज्ञानं दुःखमेकान्ततो मतम्‌ ।
सूत्रे द्रव्याश्रया: प्रोक्ता यस्माद्वै निर्गुणा: गुणा: ॥1105॥
न ज्ञानादिगुणेषूच्चैरस्ति कश्चिद्‌ गुण: सुखम् ।
मिथ्याभावाः कषायाश्च दुःखमित्यादयः कथम्‌ ॥1106॥
अन्वयार्थ : ज्ञानादि गुणों के समान कोई एक सुख गुण भी है और उसका विकार दुःख है जो अपने विपक्षी कर्म के उदय से होता है ॥११०४॥ फिर यहाँ मूर्छित ज्ञान को सर्वथा दुःख कैसे माना गया है, क्‍योंकि तत्वार्थ-सूत्र में सभी गुण द्रव्य के आश्रित और निर्गुण कहे हैं, ॥११०५॥ यदि ज्ञानादि गुणों में कोई सुख गुण नहीं है तो सभी मिथ्याभाव और कषाय आदिक दुःख कैसे हो सकते हैं ? ॥११०६॥