सत्यं चारित्रमोहस्य कार्यं स्यादुभयात्मकम् ।
असंयमः कषायाश्च पाकादेकस्य कर्मण: ॥1122॥ .
पाकाच्चारित्रमोहस्य क्रोधाद्या: सन्ति षोडश ।
नव नोकषायनामानो न न्‍यूना नाधिकास्ततः ॥1123॥
पाकात्सम्यकत्वहानिः स्यात्‌ तत्रानन्तानुबन्धिनाम ।
पाकाच्चप्रत्याख्यानस्य संयतासंयतक्षति: ॥1124 ।
प्रत्याख्यानकषायाणामुदयात्‌ संयमक्षतिः ।
संज्वलननोकषायैर्न यथाख्यातसंयमः ॥1125॥
इत्येवं सर्ववृत्तान्तः कारणकार्ययोर्द्वयोः ।
कषायनोकषायाणां संयतस्येतरस्य च ॥1126॥
किन्तु तच्छक्तिभेदाद्‌ वा नासिद्धं भेदसाधनम् ।
एकं स्याद् वाप्यनेकं च विषं हालाहलं यथा ॥1127॥
अस्ति चारित्रमोहेऽपि शक्तिद्वैतं निसर्गत: ।
एकश्चासंयतत्वं स्यात्‌ कषायत्वमथापरम्‌ ॥1128॥
अन्वयार्थ : यह ठीक है कि दोनों ही चारित्र-मोहनीय के कार्य हैं, क्‍योंकि एक चारित्र-मोहनीय के उदय से असंयम-भाव और कषाय होते हैं ॥११२२॥ चारित्र-मोहनीय के उदय से क्रोधादि सोलह कषाय और नौ नोकषाय होते हैं । इससे न न्यून होते हैं और न अधिक होते हैं ॥११२३॥ अनन्तानुबन्धी के उदय से सम्यक्त्व की हानि होती है, अप्रत्याख्यानावरण के उदय से संयतासंयत भाव की हानि होती है, प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से संयम की हानि होती है और संज्वलन और नोकषाय के उदय से यथाख्यात-संयम की हानि होती है ॥११२४-११२५॥ यह कषाय और नोकषाय तथा संयतभाव और असंयतभाव इन दोनों के कार्य-कारणभाव का पूरा खुलासा है ॥११२६॥ किन्तु चारित्र-मोहनीय में शक्ति-भेद होने से भेद का सिद्ध करना असिद्ध नहीं है । जिस प्रकार विष सामान्य एक होकर भी वह विष, हालाहल इत्यादि रूप से अनेक प्रकार का होता है, उसी प्रकार यहाँ भी जानना चाहिये ॥११२७॥ चारित्रमोहनीय में दो शक्ति निसर्ग से हैं एक असंयतत्वरूप और दूसरी कषायरूप ॥११२८॥