
सत्यं यज्जातिभिन्नास्ता यत्र कार्मणवर्गणाः ।
आलापापेक्षया संख्या तत्रैवान्यत्र न क्वचित् ॥1130॥
नात्र तज्जातिभिन्नास्ता यत्र कार्मणवर्गणाः ।
किन्तु शक्तिविशेषोऽस्ति सोऽपि जात्यन्तरात्मकः ॥1131॥
तत्र यन्नाम कालुष्यं कषायाः स्यु: स्वलक्षणम् ।
व्रताभावात्मको भावो जीव्स्यासंयमो मतः ॥1132॥
एतद्-द्वैतस्य हेतुत्वं स्याच्छक्तिद्वैतैककर्मण: ।
चारित्रमोहनीयस्य नेतरस्य मनागपि ॥1133॥
यौगपद्यं द्वोयोरेव कषायासंयतत्वयोः ।
समं शक्तिद्वस्योच्चै: कर्मणोऽस्य तथोदयात् ॥1134॥
अस्ति तत्रापि दृष्टान्तः कर्मानन्तानुबन्धि यत् ।
घातिशक्तिद्वयोपेतं मोहनं दृक्चरित्रयो: ॥1135॥
अन्वयार्थ : यह बात ठीक है कि जहाँ पर जिसकी भिन्न जातिवाली कार्मण वर्गणाएँ होती हैं, वहीं पर ही आलाप की अपेक्षा उतनी संख्या मानी जाती है और कहीं नहीं ॥११३०॥ पर यहाँ पर उस जाति की प्रथक् रूप से वे कार्मण वर्गणाएँ नहीं हैं किन्तु शक्ति विशेष अवश्य है सो वह भी जात्यन्तररूप है ॥११३१॥ प्रकृत में कलुषता का नाम कषाय है । यह उसका स्वलक्षण है और जीव के व्रत के अभावरूप जो भाव होता है वह असंयम माना गया है ॥११३२॥ इन दोनों असंयम और कषाय का हेतु दो शक्तियों को घारण करनेवाला एक चारित्र-मोहनीय कर्म है अन्य कर्म इसका थोड़ा भी कारण नहीं है ॥११३३॥ युगपत् दो प्रकार की शक्ति को धारण करनेवाले इस चारित्र-मोहनीय कर्म के उदय से ये दोनों कषाय और असंयम-भाव एक साथ होते हैं ॥११३४॥ इस विषय में अनन्तानुबन्धी कर्म ही दृष्टान्तरूप में उपस्थित किया जा सकता है, क्योंकि यह सम्यक्त्व और चारित्र इन दो को घात करने वाली दो शक्तियों से युक्त है ॥११३५॥