सत्यं तत्राविनाभावो बन्धसत्त्वोदयं प्रति ।
द्वयोरन्यतरस्यातो विवक्षायां न दूषणम्‌ ॥1137॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक है, किन्तु बन्ध, सत्व और उदय इन तीनों में से किन्हीं दो के रहने पर तीसरा अवश्य होता है इनका यहाँ अविनाभाव है, इसलिये इस विवक्षा के मान लेने पर कोई दोष नहीं आता है ॥११३७॥