+ असिद्धत्व भाव -
असिद्धत्वं भवेद्भावो नूनमौदयिको यतः ।
व्यस्ताद्वा स्यात्समस्ताद्वा जाते: कर्माष्टकोदयात्‌ ॥1138॥
सिद्धत्वं कृत्स्नकर्मभ्य: पुंसोवस्थान्तरं पृथक् ।
ज्ञानदर्शनसम्यक्त्ववीर्याद्यष्टगुणात्मकम् ॥1139॥
नेदं सिद्धत्वमत्रेति स्यादसिद्धत्वमर्थतः ।
यावत्संसारसर्वस्वं महानर्थास्पदं परम् ॥1140॥
अन्वयार्थ : असिद्धत्व भाव भी नियम से औदायिक है, क्योंकि यह अलग-अलग या मिलकर आठों कर्मों के उदय से होता है ॥११३८॥ पुरुष की समस्त कर्मों से रहित ज्ञान, दर्शन , सम्यक्त्व और वीर्यादि आठ गुणरूप जो विलक्षण दूसरी अवस्था होती है वह सिद्ध अवस्था है ॥११३९॥ इस संसार में यह सिद्धभाव नहीं होता है । जब तक महान्‌ अनर्थों का घर केवल संसार ही सब कुछ है तब तक वास्तव में असिद्धभाव होता है ॥११४०॥