जेण णिरंजणि मणु धरिउ विसयकसायहिं जंतु ।
मोक्खह कारणु एतडउ अवरइं तंतु ण मंतु ॥62॥
अन्वयार्थ :
विषय-कषायों में जाते हुए मन को रोककर निरंजन तत्त्व मे स्थिर करो । बस ! इतना ही मोक्ष का कारण है । दूसरा कोई तंत्र या मंत्र मोक्ष का कारण नहीं है ।