कम्मु पुशइउ जो खवइ अहिणव पेसु ण देइ ।
परमणिरंजणु जो णवइ सो परमप्पउ होइ ॥77॥
अन्वयार्थ :
जो जीव पुराने कर्मों को खपाता है, नये कर्मों का प्रवेश नहीं होने देता तथा जो परम निरंजन-तत्त्व को नमस्कार करता है, वह स्वयं परमात्मा बन जाता है ।