पाउ वि अप्पहिं परिणवइ कम्मइं ताम करेइ ।
परमणिरंजणु जाम ण वि णिम्मलु होइ मणेइ ॥78॥
अन्वयार्थ :
आत्मा जबतक निर्मल होकर परम निरंजन स्वरूप को नहीं जानता, तब तक ही वह पापरूप परिणमता है और तभी तक कर्मों को बांधता है ।