अण्णु णिरंजणु देउ पर अप्पा दंसणणाणु ।
अप्पा सच्चउ मोक्‍खपहु एहउ मूढ वियाणु ॥79॥
अन्वयार्थ : आत्मा ही उत्कृष्ट निरंजनदेव है, आत्मा ही दर्शन-ज्ञान है, आत्मा ही सच्चा मोक्षपथ है -- ऐसा हे मूढ ! तू जान ।