ताम कुतित्थइं परिभमइं धुत्तिम ताम करंति ।
गुरुहुं पसाएं जाम ण वि देहहं देउ मु्णंति ॥80॥
अन्वयार्थ :
लोग कुतीर्थ में तभी तक परिभ्रमण करते हैं और तभी तक धूर्तता करते हैं, जब तक वे गुरु के प्रसाद से देह में ही रहे हुए देव को नहीं जान लेते ।