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गाथा ८१-९०
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लोहिं मोहिउ ताम तुहं विसयहं सुक्ख मुणेहि ।
गुरुहं पसाएं जाम ण वि अविचल बोहि लहेहि ॥81॥
अन्वयार्थ :
हे जीव ! तभी तक तू लोभ से मोहित होकर विषयों में सुख मानता है, जब तक गुरु-प्रसाद से अविचल बोध को नहीं पाता ।