उप्पज्जइ जेण विबोहु ण वि बहिरण्णउ तेण णाणेण ।
तइलोयपायडेण वि असुंदरो जत्थ परिणामो ॥82॥
अन्वयार्थ :
जिससे विशेष बोध
(भेदज्ञान)
उत्पन्न न हो ऐसे तीनलोक संबंधी ज्ञान से भी जीव बहिरात्मा ही रहता है और उसका परिणाम असुन्दर
(अच्छा नहीं)
है ।