
तासु लीह दिढ दिज्जइ जिम पढ़ियइ तिम किज्जइ ।
अह व ण गम्मागम्मइ तासु भजेसहिं अप्पुणु कम्मइं ॥83॥
अन्वयार्थ : आत्मा और कर्म के बीच में भेद-ज्ञान की दृढ़ रेखा खींच लेना चाहिये; चित्त को इधर-उधर भटकाना नहीं चाहिये । ऐसा करनेवाले की आत्मा में से कर्म दूर हो जाते हैं ।