वक्‍खाणडा करंतु बुहु अप्पि ण दिण्णु णु चित्तु ।
कणहिं जि रहिउ पयालु जिम पर संगहिउ बहुत्तु ॥84॥
अन्वयार्थ : जो विद्वान आत्मा का व्याख्यान तो करते हैं, परन्तु अपना चित्त उसमें नहीं लगाते तो उन्होंने अनाज के कणों से रहित बहुत-सा पयाल संग्रह किया ।