पंडिय पंडिय पंडिया कण छंडिवि तुस कंडिया ।
अत्थे गंथे तुठ्ठो सि परमत्थु ण जाणहि मूढो सि ॥85॥
अन्वयार्थ : पंडितों में पंडित ऐसा हे पंडित ! यदि तू ग्रंथ और उसके अर्थों में ही संतुष्ट हो गया है, किन्तु परमार्थ-आत्मा को जानता नहीं तो तू मूर्ख है; तूने कण को छोडकर तुष को ही कूटा है ।