
अक्खरडेहिं जि गव्विया कारणु ते ण मुणंति ।
वंसविहत्था डोम जिम परहत्थडा धुणंति ॥86॥
अन्वयार्थ : जो मोक्ष के सच्चे कारण को तो जानते नहीं और मात्र अक्षर-ज्ञान से ही गर्वित होकर घूमते हैं, वे तो वंश-रहित वेश्यापुत्र के जैसे जहाँ-तहाँ हाथ लंबाकर भीख माँगते भटकते हैं ।