णाणतिडिक्की सिक्खि वढ किं पढियइं बहुएण ।
जा सुंधुक्की णिड्डहइ पुण्णु वि पाउ खणेण ॥87॥
अन्वयार्थ :
हे वत्स ! बहुत पढ़ने से क्या है ? तू ऐसी ज्ञान-चिनगारी प्रगटाना सीख ले, जो प्रज्वलित होते ही पुण्य और पाप को क्षणमात्र में भस्म कर दे ।