सयलु वि को वि तडप्फडइ सिद्धत्तणहु तणेण ।
सिद्धत्तणु परि पावियइ चित्तह॑ णिम्मलएण ॥88॥
अन्वयार्थ :
सभी कोई सिद्धत्व के लिये तड़फड़ाते हैं, पर उस सिद्धत्व की प्राप्ति चित्त की निर्मलता से ही होती है ।