केवलु मलपरिवज्जियउ जहिं सो ठाइ अणाइ ।
तस उरि सतु जगु संचरह परइ ण कोइ वि जाइ ॥89॥
अन्वयार्थ : मल-रहित ऐसे केवली अनादि स्थित हैं, उनके अंतर में (ज्ञान में) समस्त जगत्‌ संचार करता है, जिसके बाहर कोई भी नहीं जा सकता ।