अप्पा अप्पि परिट्ठियएउ कहिं मि ण लग्गइ लेउ ।
सव्वु जि दोसु महंतु तसु जं पुणु होइ अछेउ ॥90॥
अन्वयार्थ :
जब आत्मा आत्मा में ही स्थित हो जाता है, तब उसे कोई लेप
(मल)
नहीं लगता और उसके जो कोई महादोष हों, वे भी सब नाश हो जाते हैं ।