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गाथा ९१-१००
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जोइय जोएं लइयइण जइ धंधइ ण पडिसि ।
देहकुडिल्ली परिखिवइ तुहुं तेमइ अच्छेसि ॥91॥
अन्वयार्थ :
हे योगी ! योग लेकर फिर यदि तू धंधे में नहीं पडेगा तो जिसमें तू रहता है, उस देहरूप कुटीर का क्षय हो जायगा और तू तब भी अक्षय रहेगा ।