अरि मणकरह म रइ करहि इंदियविसयसुहेण ।
सुक्खु णिरंतरु जेहिं ण वि मुच्चहि ते वि खणेण ॥92॥
अन्वयार्थ :
रे मनरूपी हाथी ! तू इन्द्रिय-विषय के सुखों में रति मत कर । जिनसे निरंतर सुख नहीं मिलता, उनको तू क्षणमात्र में छोड़ दे ।