तूसि म रूसि म कोहु करि कोहें णासइ धम्मु ।
धम्मिं णठ्ठिं णरयगइ अह गउ माणुसजम्मु ॥93॥
अन्वयार्थ :
न राजी हो, न रोष कर, न क्रोध कर; क्रोध से धर्म का नाश होता है; धर्म के नाश होने से नरकगति होती है तथा मनुष्य-जन्म निष्फल जाता है ।