हत्थ अहुठ्ठह॑ देवली वालहं णा हि पवेसु ।
संतु णिरंजणु तहिं वसइ णिम्मलु होइ गवेसु ॥94॥
अन्वयार्थ :
साढ़े तीन हाथ की देह में, बालक जिसमें प्रवेश नहीं कर सकते, संत-निरंजन बसता है । तू निर्मम होकर उसको ढूँढ ।