अप्पापरहं ण मेलयउ मणु मोडिवि सहस त्ति ।
सो वढ जोइय किं करइ जासु ण एही सत्ति ॥95॥
अन्वयार्थ :
मन को सहसा मोड लेने से
(स्व-सन्मुख करने से)
आत्मा और पर का मिलान नहीं होता; परन्तु जिसकी इतनी भी शक्ति नहीं है वह मूर्ख योगी क्या करेगा ?