सो जोयउ जो जोगवइ णिम्मलि जोइय जोइ ।
जो पुणु इंदियवसि गयउ सो इह सावयलोइ ॥96॥
अन्वयार्थ :
योगी जो निर्मल ज्योति को जगाते हैं, वही योग है, किन्तु जो इन्द्रियों के वश हो जाते हैं वे तो ये श्रावकलोग हैं ।