बहुयइं पढियइं मूढ पर तालू सुक्कई जेण ।
एक्कु जि अक्खरु तं पढहु सिवपुरि गम्मइ जेण ॥97॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! तू बहुत पढ़ा......पढ़-पढ़कर तेरा तालू भी सुख गया, फिर भी तू मूर्ख ही रहा । अब तू एक ही उस अक्षर को पढ़ कि जिससे शिवपुरी में गमन हो ।