अन्तो णत्थि सुईणं कालो थोओ वयं च दुम्मेहा ।
ते णवर सक्खियव्वं जिं जरमरणक्खयं कुणहि ॥98॥
अन्वयार्थ :
श्रुतियों का अंत नहीं है, काल थोड़ा है और हम मंदबुद्धि हैं; अतः केवल इतना ही सीखना योग्य है कि जिससे जन्म-मरण का क्षय हो ।