णिल्लक्खणु इत्थीबाहिरउ अकुलीणउ महु मणि ठियउ ।
तसु कारणि आणी माहू जेण गवंगउ संठियउ ॥99॥
अन्वयार्थ : निर्लक्षण (इंद्रियग्राह्म लक्षणों से पार), स्त्री से रहित और जिसके कोई कुल नहीं है, ऐसा आत्मा मेरे मन में बस गया है; जिससे अब इन्द्रिय-विषयों में संस्थित मेरा मन वहाँ से पीछे हट गया है ।