हुई सगुणी पिउ णिग्गुणउ णिल्लक्खणु णीसंगु ।
एकहिं अंगि वसंतयहं मिलिउ ण अंगहिं अंगु ॥100॥
अन्वयार्थ :
मैं सगुण हूँ ओर मेरा पियु तो निर्गुण, निर्लक्षण तथा नि:संग है; अतः वे एक ही अंग में बसते हुए भी उनका एक दूसरे के अंग से अंग का मिलन नहीं होता ।