+ गाथा १०१-११० -
सव्वहिं रायहिं छहस्सहिं पंचहिं रूवहिं चित्तु ।
जासु ण रंजिउ भुवणयलि सो जोइय करि मित्तु ॥101॥
अन्वयार्थ : जिसका चित्त सर्व रागों में, छह रसों में व पांच रूपों में रंजित नहीं है ऐसे योगी को है जीव! तू इस भुवनतल में अपना मित्र बना ।