तव तणुअं मि सरीरयहं संगु करि ठ्ठिउ जाहं ।
ताहं वि मरणदवक्कडिय दुसहा होइ णराहं ॥102॥
अन्वयार्थ :
जिसका तप थोड़ा भी शरीर का संग करके स्थित है
(जो तप करते हुए भी शरीर का महत्त्व रखता है)
उस मनुष्य को भी मरण के दुस्सह दावानल सहन करना पड़ता है ।