देह मलंतहं सवु गवइ मइ सुइ धारण धेउ ।
तहिं तेहइं वढ अवसरहिं विरला सुमरहिं देउ ॥103॥
अन्वयार्थ : जब देह गलती है, तब मति-श्रुत की धारणा-ध्येय सब गलने लगता है; हे वत्स! तब उस अवसर में देव का स्मरण तो कोई विरले ही करते हैं ।