उम्मणि थक्का जासु मणु भग्गा भूवहिं चारू ।
जिम भावइ तिम संचरउ ण वि भउ ण वि संसारु ॥104॥
अन्वयार्थ : जिसका पवित्र मन संसार के सुन्दर पदार्थों से भागकर, मन से पार ऐसे चैतन्य-स्वरूप में लग गया, फिर वह कहीं भी संचार करे तो भी उसे न भय है, न संसार ।