जीव वहंति णरयगइ अभयपदाणें सग्गु ।
वे पह जवला दरिसियइं जहिं भावइ तहिं लग्गु ॥105॥
अन्वयार्थ :
जीवों के वध से नरकगति होती है और अभय प्रदान करने से स्वर्ग । जाने के लिये दो पथ तुमको बतला दिये । अब इनमे से जो अच्छा लगे, उसमें तुम लग जाओ ।