सुक्खअडा दुइ् दिवहडइं पुणु दुक्‍खहं परिवाडि ।
हियडा हउं पइं सिक्खवमि चित्त करिज्जहि वाडि ॥106॥
अन्वयार्थ : इस संसार में इन्द्रिय सुख तो दो दिन के हैं, फिर तो दुःखों की ही परिपाटी है । इस कारण हे हृदय ! मैं तुझे सिखाता हूँ कि तेरे चित्त को तू बाड़ लगा (मर्यादा में रख ओर उसको सच्चे मार्ग मे लगा)