मूढा देह म रज्जियइ देह ण अप्पा होइ ।
देहहं भिण्णु णाणमउ सो तुहुं अप्पा जोइ ॥107॥
अन्वयार्थ :
हे मूढ ! देह में रंजायमान न हो; देह आत्मा नहीं है । देह से भिन्न ज्ञानमय ऐसे आत्मा को तू देख ।