जेहा पाणहं झुंपडा तेहा पुत्तिए काउ ।
तित्थु जि णिवसइ पाणिवइ तहिं करि जोइय भाउ ॥108॥
अन्वयार्थ :
अरे! यह मूर्त काया तो घास की झोपड़ी जैसी है; हे योगी ! उसमें जो प्राणवंत-चेतन निवास करता है, उसकी तू भावना कर ।