मूलु छंडि जो डाल चडि कहं तह जोयाभासि ।
चीरु ण वुणणहं जाइ वढ विणु उठ्ठियइं कपासि ॥109॥
अन्वयार्थ : मूल को छोड़कर जो डाल पर चढ़ना चाहता है, उसको योग-अभ्यास कैसा ? हे वत्स ! जैसे बिना ओटे हुए कपास में से वस्त्र नहीं बुना जाता, उसीप्रकार मूलगुण के बिना उत्तरगुण नहीं होते ।